Sunday, 2 September 2012

केदारनाथ से बद्रीनाथ, KEDARNATH TO BADRINATH


केदारनाथ से बद्रीनाथ  

तीसरे दिन सुबह 8 बजे सभी तैयार होकर बस मे बैठ गये. अब हमारी मंज़िल बद्रीनाथ धाम थी. मैंने ड्राइवर से पूछा, अब किस रास्ते से चलोगे? यहाँ से बद्रीनाथ जाने के लिए दो रास्ते थे पहला कुंड से चोपता होते हुए. दूसरा वापस रुद्रप्रयाग से है. मैं चोपता होकर जाना चाहता था क्योंकि चोपता की प्राक्रतिक सुंदरता के बारे में काफ़ी कुछ पढ़ रखा था. पर बंगाली बाबू रुद्रप्रयाग से चलने के लिए कह रहे थे. पर जब मैंने उन्हे समझाया तो वह राज़ी हो गये.
सीतापुर से चल कर ड्राइवर ने बस गुप्तकाशी में रोक दी बोला आप लोग उपर पहाड़ी पर मंदिर में जा कर दर्शन कर आए. थोड़ा सा चढ़ने के बाद सोचा कहाँ जाएँगे? फिर हिम्मत कर के मंदिर तक पहुँच ही गये. मंदिर के बाहर ही दो-चार पंडा बैठे थे. हम लोंगो को देख कर बोले पूजा की थाली ले ले. चलिए आपको पूजा करवा देते हैं. मैने भी सोंचा की धर्म-कर्म के लिए ही तो यहाँ आए हैं, वैसे भी इन पंडा पुजारी का खर्च भी तो हम लोगों की दान दक्षिणा से ही तो चलता है. केदारनाथ के कपाट खुलते समय भगवान की डोली, यहाँ इस मंदिर की परिक्रमा करके ही आगे बढ़ती है. गुप्तकाशी के मुख्य मंदिर के अंदर शिवलिंग स्थापित है साथ में ही केदारनाथ की छोटी प्रतिकृति भी विराजित है. मंदिर के सामने एक छोटा सा कुंड बना है इस कुंड में  अलग-अलग दो जल धाराएँ गिर रही है. वहाँ पंडा जी ने बताया कि बाई ओर की धारा से यमुनौत्री का जल आ रहा है और दाई ओर की धारा से गंगौत्री का जल निकल रहा है. मुख्य मंदिर के साथ में अर्धनारीश्वर का मंदिर है. भगवान शिव ने पांडवों को अर्धनारीश्वर के रूप में दर्शन दिए थे. यहाँ से पूजा के बाद हम आगे के लिए चल दिए. कुंड से आगे चोपता के मार्ग पर बढ़ते ही दोनो ओर हरे-भरे पेड़ों का जंगल नज़र आने लगा. यहाँ सड़क साफ अच्छी बनी हुई थी. ड्राइवर भी तेज़ी से बस चला रहा था. चोपता पहुँचते–पहुँचते, हमें अपने बाई ओर बर्फ़ से आच्छादित पर्वत श्रेणी दिखने लगी. ज्यों-ज्यों बस बढ़ रही थी, पर्वतों की चोटियाँ स्पष्ट होती जा रही थी. बहुत ही मनमोहक नजारा था. चोपता पहुँचने पर बस ड्राइवर ने बस रोक दी. सामने ही तुंगनाथ मंदिर जाने के लिए रास्ता था. सड़क के दोनो ओर बर्फ़ से ढकी चोटियाँ नज़र आ रही थी. चोपता के बारे में पढ़ा था, स्विट्ज़रलैंड ऑफ इंडिया है. कोई शक नहीं? हिन्दुस्तान में चोपता की प्राकृतिक सुंदरता नायाब है. कौसानी के बारे में महात्मा गाँधी ने स्विट्ज़रलैंड ऑफ इंडिया कहा था. वहाँ उन्होंने अपना आश्रम भी बनाया, परन्तु चोपता की सुंदरता के आगे कौसानी कहीं नही टिकता है. जो भी चोपता आता है वह यहाँ की खूबसूरती को भूल नहीं सकता. यहाँ पर हम लोग लगभग आधा घंटा रुक कर आस-पास के नज़ारे देखते रहे. हमने साथ के बंगाली बाबू से पूछा, क्यों जी यहाँ कैसा लग रहा है? कहाँ तो वह इस रास्ते से आना नही चाहते थे, पर अब यहाँ की सुंदरता देख कर बार-बार मेरे से कहने लगे, आपने बहुत अच्छा किया जो आप हमें इस रास्ते से ले आए वरना हमें पता ही नहीं चलता कि यह कितनी खूबसूरत जगह है?
चोपटा


चोपटा

चोपटा




चोपटा


चोपटा



तुंगनाथ से चमोली का रास्ता हरे-भरे जंगलों से घिरा हुआ है. इस रास्ते पर ज़्यादा वाहन नहीं चल रहे थे. हमलोग दोपहर दो बजे चमोली पहुँच गये. यहाँ ड्राइवर ने एक होटल के सामने बस रोकते हुए कहा कि सब लोग जल्दी से खाना खा लो. अगर हम 4 बजे तक जोशीमठ पहुँच जाए तो बद्रीनाथ जाने का मार्ग खुला मिल जाएगा. फिर हमें रास्ते में कहीं ना रुक कर सीधे बद्रीनाथ पहुँच जाएँगे. सभी ने 15 मिनट में दोपहर का भोजन किया और बस में बैठ गये. चमोली से बद्रीनाथ का मार्ग काफ़ी चौड़ा था. ड्राइवर तेज़ी से बस चला रहा था. गनीमत हुई की रास्ते में कोई बाधा नहीं आई और हम लोग 4 बजे जोशीमठ पहुँच गये. अभी बद्रीनाथ जाने का मार्ग खुला था. हमारी बस के निकलने बाद ही बद्रीनाथ जाने के लिए रास्ता बंद कर दिया गया. जोशीमठ से आगे का मार्ग संकरा है इस कारण दो-दो घंटे के इंटरवल से जोशीमठ से बद्रीनाथ जाने का मार्ग खोला जाता है.

चमोली से कुछ आगे ही हमें पाया कि सड़क के किनारे अलकनंदा पर कुछ अन्य विधुत परियोजनाओं पर काम चल रहा था. जोशीमठ से आगे बढ़ते ही हमें सड़क के किनारे लगे हुए jaypee के सैकड़ों बोर्ड नज़र आने लगे. हर एक बोर्ड पर बड़ा-बड़ा.” NO DREAM TOO BIG” jaypee लिखा हुआ था. ऐसा लग रहा था, अब हम किसी की प्राइवेट एस्टेट में से होकर गुजर रहे है. ज्यों-ज्यों हम विष्णु प्रयाग की ओर बढ़ रहे थे अलकनंदा में जल कम होता जा रहा था. विष्णुप्रयाग के पास तो अलकनंदा मे जल ही नहीं नज़र आ रहा था. विष्णुप्रयाग पहुँचने पर पता लगा की यहाँ पर jaypee ने अपनी विधुत परियोजना लगाई हुई है. इस कारण अलकनंदा का जल विष्णु प्रयाग में रोक रखा था. चारों ओर jaypee..” NO DREAM TOO BIG” के बोर्ड लगे थे . ऐसा लग रहा था कि हम पर ठठाकर हँस रहा है और कह रहा है कि देखो किस तरह हम प्रकृति का दोहन कर के इतने बड़े हो गये है अफ़सोस कि यह लोग हम सबकी इस जल संपदा का दोहन कर के हमें ही चिढ़ा रहे है. इन्ही विचारों को लिए हुए हम बद्रीनाथ धाम पहुँच गये. इस बार भी बाकि लोंगों ने तो उसी होटल में कमरा लिया जहाँ पर ड्राइवर ने बस रोकी थी पर हमने परमार्थ निकेतन में 4 बेड का एक कमरा 400 रुपये प्रति दिन के हिसाब से ले लिया. समान कमरे में रख कर हम सब मंदिर दर्शन के लिए चल दिए. रात हो चुकी थी मंदिर के बाहर लगी लाइटों से मंदिर प्रकाशित हो रहा था. मंदिर में भगवान बद्रीविशाल के रात्रि शयन की आरती होने जा रही थी. इसलिए मंदिर के अंदर नहीं जाने दे रहे थे. हम सब दूर से ही दर्शन कर के वापस आ गये.
 बद्रीनाथ  मंदिर   
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परमार्थ निकेतन की अपनी कैंटिन है, पर सीजन ना होने के कारण बंद थी. रात के खाने का इंतज़ाम करना था. परमार्थ निकेतन से बाहर कई होटल रेस्टोरेंट बने हुए थे. पर अधिकतर खाली थे. एक रेस्टोरेंट में जाकर खाना पैक करवाया. जब तक वह खाना तैयार करने लगा मैं वहीं बैठे एक पंडा से बात करने लगा. बातों ही बातों मे पता लगा कि वह वहीं पर एक दूसरी धर्मशाला के caretaker है. बोले हम तो आपको 200 रुपये में कमरा दे देते. मैंने कहा कोई बात नही. अब तो ले ही लिया है. वही सीजन के समय 2500 में भी नही मिलता है. बातों ही बातों में इस धाम ( बद्रीनाथधाम ) की चर्चा होने लगी, मैंने कहा सच तो यह है पंडित जी कि मुझे लगता है कि यहाँ तो केवल शुद्ध ह्रदय से भगवान बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आने वाले ही आ सकते है. पापी लोग तो यहाँ पहुँच ही नहीं सकते. बद्रीनाथ मंदिर से पहले देवदर्शनी है. यहाँ से मंदिर दिखने लगता है. देवदर्शनी के पास ही एकादशी का मंदिर है. कहते है माँ एकादशी यहीं प्रकट हुई थी.
यहाँ पहुँच कर अचानक मन में विचार आने लगे कि लोग क्यों झूठ, फरेब, धोखाधड़ी कर के पैसे कमाने की दौड़ में लगे हुए है? देखता हूँ लोग 60-70 और उससे भी अधिक उम्र के हो गये हैं पर लगे हुए हैं दौड़ में. मैं पूछता हूँ अरे किसके लिए यह सब कर रहे हो? सच तो यह है की सब कुछ तो यहीं छोड़ कर जाना है. लेकिन नहीं, लगे हैं कैसे किसको टोपी पहनाए?
सुबह चार बजे से ही कानों मे आस-पास के मंदिरों में हो रही आरती की आवाज़ गूंजने लगी. पर थकान के कारण सोते रहे. करीब 6 बजे सोकर उठे तो बाहर आकर देखा हमारे चारों ओर विशालकाय पर्वत खड़े हैं. इन पहाड़ों की चोटियों पर पड़ी वर्फ़ सूर्य की रोशनी में चमक रही थी. जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए चल दिए. जैसी की परम्परा है कि दर्शन से पहले मंदिर के नीचे बने हुए तप्त कुंड में स्नान किया जाता है.
 अलकनंदा पर बने इस पुल से मंदिर जाते है. 

 नीचे बने हुए तप्त कुंड

मंदिर मे दर्शन के लिए दूर तक बना टीन शेड 

हमारे लिए तो सब कुछ नया था. हम भी पूछते हुए वहाँ पहुँचे. यह एक छोटा सा टैंक था जिसमें कुछ लोग नहा रहे थे कुछ लोग बाहर बैठ कर मग से तप्त कुंड का पानी ले कर नहा रहे थे. तप्त कुंड का जल काफ़ी गर्म था. बाहर मौसम में ठंडक थी पर फिर भी तप्त कुंड का जल शरीर पर डाला नहीं जा रहा था. लोग इसके अंदर नहा रहे थे. तभी वहाँ नहा रहे लोगों ने बताया कि पहले जल को मग से अपने उपर डाले. जब शरीर सहने लायक हो जाये तो जल्दी से इस कुंड में उतर आए. मैंने ऐसा ही किया. वहीं लोगों ने बताया की गर्म जल सर पर ज़्यादा नहीं डालना चाहिए, वरना तबीयत खराब हो सकती है.

स्नान के बाद पूजा की थाली लेकर हम पहले आदिकेदार के दर्शन के लिए गये. कहते है , बद्रीविशाल के दर्शन से पहले आदिकेदार के दर्शन करना चाहिए. यह मंदिर तप्त कुंड से आगे बद्रीनाथ के मंदिर को जाते हुए मंदिर के बाई ओर बना हुआ है. यहाँ मंदिर में पत्थर पर श्री नारायण के पैरों के निशान बने हुए थे. यहाँ पूजा करके पुजारी जी से तिलक लगवा कर भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए गये. भगवान बद्रीविशाल पद्मासन में ध्यान मुद्रा में बैठे हुए हैं. मंदिर में भीड़ नहीं थी. वरना तो फटाफट दर्शन करो और बाहर निकलो. वहाँ गद्दी पर बैठे रावल जी बताने लगे की भगवान ध्यान मुद्रा में है. विग्रह स्पष्ट नहीं मंदिर भगवान के ललाट पर हीरा लगा हुआ है. दाहिनी ओर कुबेर और गणेश जी तथा बाई ओर उद्धव जी, नर-नारायण, गरूण जी, नारद जी, है. उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सवमूर्ति है मस्तक पर लगे हीरे को देख कर ऐसा लग रहा था की हरे रंग का नाईट बल्ब (जिसे आम बोलचाल में ज़ीरो वाट का वल्व कहते है) जल रहा हो, हम लोग थोड़ी देर वहाँ एक-टक निहारते रहे, तभी एक दंपति वहाँ विशेष पूजा के लिए आए. रावल जी मंत्रोचार करने लगे. हमें लगा कि इससे पहले, हमको बाहर जाने के लिए कहे, बाहर चलना चाहिए. भगवान के सामने से हट कर बाहर को निकलने लगा, कि तभी मंत्रोचर करते हुए रावल जी ने इशारे से अपने पास बुलाया और माथे पर चंदन का लेप प्रसाद के रूप में लगा दिया. मंदिर की परिक्रमा करके खड़ा हुआ ही था कि तभी एक साधू ने आ कर पूछा भगवान का प्रसाद लोगे, मन में आया नेकी और पूछ-पूछ, मैंने कहा क्यों नहीं महाराज साधु ने भगवान बद्रीविशाल को चढ़ने वाले केसर युक्त मीठे चावल का प्रसाद दिया. यहाँ चरणामृत केसरयुक्त मीठा था. बद्रीनाथ मंदिर के दाहिनी ओर लक्ष्मी जी, गणेश जी, हनुमान जी का मंदिर है.
  
बद्रीनाथ मंदिर



बद्रीनाथ मंदिर



मंदिर के पाट  लगभग छह माह बंद रहते है. बद्रीनाथ मंदिर के पाट बंद होने के बाद नारद जी भगवान की पूजा करते हैं. विशेष बात यह है  बद्रीनाथ मंदिर के पाट बंद करते समय जो ज्योति जलाई जाती है वह ज्योति पाट खोलते समय जलती हुई मिलती है.
बद्रीनाथ मंदिर


बद्रीनाथ की आरती 
श्री पवन मंद सुगंध शीतल , हेम मंदिर शोभितम्
निकट गंगा बहत निर्मल . श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
शेष सुमरिन करत निशदिन , धरत ध्यान महेश्वरम्
श्री वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
शक्ति गौरी गणेश शारद ,नारद मुनि उच्चारणम्
वेद ध्यान अपार लीला ,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
यक्ष किन्नर करत कौतुक ,ज्ञान गन्धर्व प्रकाशितम्
श्री लक्ष्मी कमला चंवर डोले ,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
कैलाश में इक देवी निरंजन ,शैल शिखर महेश्वरम् 
राजा युधिष्ठर करत स्तुति।,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
श्री बद्रीनाथ के पंचरत्न ,पढ़त पाप विनाशनम् 
कोटि तीर्थ भए पुण्यों ,प्राप्ते फलदायकम्।

मंदिर से बाहर आकर पूजा की थाली दुकानदार को वापस की.  ध्यान आया ब्रह्मकपाल चलते है. पूछने पर पता लगा मंदिर से करीब 100 गज पीछे अलकनंदा के किनारे ब्रह्मकपाल  है. ब्रह्मकपाल के बारे में कथा है कि जब शिव जी ने ब्रह्मा जी का पाँचवा सिर काट दिया तो उन्हे ब्रह्महत्या लग गयी और वह सिर उनके हाथ में चिपक गया. बहुत कोशिश के बाद भी नहीं छूटा. शिव सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके जब इस स्थान पर आए तो यहाँ पर उनके हाथ से स्वयं सिर छिटक गया और शिव ब्रह्म हत्या से मुक्त हो गये. तब शिव जी ने कहा जो भी इस स्थान पर अपने पितरों का श्राद्ध और पिंड दान करेगा उसकी सात पीढ़ी तक मोक्ष को प्राप्त हो जाएँगी. तभी से इस स्थान का नाम ब्रह्मकपाल पड़ गया. कहते हैं कि इस स्थान पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने से प्राणी बार-बार के जन्म म्रत्यु के बंधन से मुक्त हो कर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है. यहाँ पर श्राद्ध में पहले मीठे चावल के पिंड बना कर अर्पण एक पंडा करवाते हैं, फिर ब्रह्मकपाल से नीचे स्थित ब्रह्मकुंड के पास जल से दूसरे पंडा तर्पण करवाते हैं, इसके बाद शुद्धि के लिए वापस ऊपर ब्रह्मकपाल के पास जाकर हवन द्वारा शुद्धि एक तीसरे पंडा करवाते हैं. पंडा ने बताया कि यहाँ पर श्राद्ध करने के बाद फिर कहीं भी श्राद्ध नही किया जाता है.

ब्रह्मकपाल के पास    अलकनंदा

ब्रह्मकपाल के पास    अलकनंदा

श्री नारायण अदृश्य रूप से अपने भक्तों को देखते हैं व उनका कल्याण करते हैं लेकिन इस स्थान पर वही लोग जा सकते हैं जिन्हें श्री हरि अपने पास बुलाते हैं. बद्रीनाथ धाम एक पुण्य भूमि है कहते हैं यहाँ जो भी ही श्रद्धा से आता है वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है. इसलिए ही इस भूमि को भू-वैकुंठ कहते है. इस भूमि के बारे में कहा गया है कि यहाँ पर एक दिन के तप का लाभ 10000 वर्षों के तप के बराबर मिलता है, कहते हैं दानव सहस्रकवच ने सूर्य देव की तपस्या करके 1000 कवच प्राप्त किए थे. और एक कवच को वही तोड़ सकता था जिसने 10000 वर्ष तप किया हो. इस तरह से वह तीनों लोक में अजय हो गया. जब उसके कुकर्त्यों से मानव, देवता, ऋषि, मुनि सभी त्राहि-त्राहि करने लगे तब सभी भगवान श्री नारायण के पास पहुँच, सहस्रकवच को हराने के लिए यह ज़रूरी था कि आत्मचिंतन किया जाय, श्री नारायण ने चिंतन कर के जाना कि हिमालय पर केदार खंड में यही स्थान ऐसा है जहाँ एक दिन तपस्या करके 10000 वर्ष का फल प्राप्त होता है. वह इस स्थान पर आकर आत्म चिंतन में लीन हो गये. बाद में नर, नारायण के रूप में जन्म लिया. अलकनंदा के एक तट पर नर ने तपस्या की और अलकनंदा के दूसरे तट पर नारायण ने तपस्या की. जिस तट पर नर ने तपस्या की वह नर पर्वत कहलाया और जिस पर्वत के नीचे अलकनंदा के दूसरे तट पर नारायण ने तपस्या की वह नारायण पर्वत कहलाता है. बद्रीनाथ का मंदिर नारायण पर्वत पर स्थित है. सहस्रकवच जब युद्ध के लिए आया तब एक दिन नर युद्ध करते और उसका एक कवच तोड़ देते दूसरे दिन नर तपस्या करने बैठ जाते और सहस्रकवच से नारायण युद्ध करते और उसका एक कवच तोड़ देते . बारी-बारी से एक भाई तप करता तो दूसरा भाई युद्ध करता. इस तरह से उसके 999 कवच तोड़ दिए तब सहस्रकवच युद्ध भूमि से भाग कर सूर्य देव की शरण में चला गया.
कहते हैं यहाँ आकर भागवत कथा का श्रवण थोड़ी हो सके तो जरुर करना चाहिए. मैं जिस दिन 

बद्रीनाथ धाम से चल रहा था उसी दिन परमार्थ निकेतन में विशाल शामियाना श्रीमद् भागवत 

कथा के लिए लगाया जा रहा था. करीब 300 लोगों के एक सप्ताह ठहरने और भागवत कथा 

श्रवण का कार्यक्रम था. इस बार तो इस संयोंग का लाभ नहीं उठा पाया पर अगली बार अवश्य.  


वापस आकर हमने ड्राइवर से प्रोग्राम पूछा तो बोला आज ही वापस चलना है. मैंने कहा, आज तो चौथा दिन है पाँच दिन का टूर है तो कल चलना. बोला अभी आपको माना गाँव ले चलता हूँ उसके बाद वापस चलना है. एक दिन में बद्रीनाथ से हरिद्वार नहीं पहुँच सकते. बद्रीनाथ से माना गाँव 3 किलोमीटर की दूरी पर अलकनंदा के किनारे बसा हुआ है. मुश्किल से 10-15 मिनट में ही हम माना पहुँच गये. और इतनी सी दूरी के ड्राइवर ने हमसे 60 रुपये सवारी के हिसाब से अलग से ले लिया.
माना गाँव जिसे की पुराणों मे मणिभद्र पुरम के नाम से जाना जाता है. यहाँ से ही सरस्वती नदी के दर्शन होते है. कहते हैं की यहाँ से निकल कर वह भूमिगत हो जाती हैं बाद में इलाहाबाद में उनकी धारा दिखती है. मन में जिज्ञासा लिए हुए हम आगे बढ़े. यहाँ एक स्थान से दो रास्ते जा रहे थे एक गणेश गुफा के लिए दूसरा सरस्वती नदी के उदगम स्थल के लिए. हम पहले सरस्वती नदी के लिए गये. देखा पहाड़ के मध्य से सरस्वती की जल धारा निकल कर पतले से गलियारे में गिर रही है. साथ में ही सरस्वती देवी छोटा सा मंदिर है. वही पर एक चाय की दुकान है जिस पर लिखा है अंतिम चाय की दुकान. हम लोगों ने सरस्वती मंदिर में जाकर के दर्शन किए वहीं पास में एक बोर्ड लगा था केशव प्रयाग, अलकनंदा व सरस्वती का संगम.

माना गाँव का रास्ता 


माना गाँव 


माना गाँव



 सरस्वती नदी उदगम स्थल

 सरस्वती नदी  उदगम स्थल


 सरस्वती नदी  के पास भारत की अंतिम चाय की दुकान


भीम पुल 


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गणेश गुफा पर लगा शिला लेख


माना गाँव , ऊन से तैय्यार किए हुए कालीन


माना गाँव





मैंने दुकानदार से पूछा, मैंने तो पढ़ा है कि सरस्वती नदी यहाँ से निकल कर भूमिगत हो गयी है फिर यह अलकनंदा में कैसे मिल गयी. दुकानदार ने बताया की केशव प्रयाग में बहुत थोड़ा सा ही पानी अलकनंदा में मिलता है बाकी सारा भूमिगत हो जाता है. वहीं पर भीम पुल है. भीम पुल के साथ में एक साधु ने धुनी रमा रखी है. वहीं पर एक छोटी सी जलधारा बह कर सरस्वती में मिल रही थी. वहाँ पर लिखा था कि यह जलधारा मानसरोवर के जल की है. हमारे पास पानी की बोतल तो थी ही, हम सबने पहले तो उस जल को पिया फिर बोतल में भर कर साथ ले आया.
वहीं पर दो यूरोपियन पुरुष गेरुए वस्त्र में आए हुए थे. उनसे बात करने लगा, बहुत ही अच्छी हिन्दी वह लोग बोल रहे थे. बताने लगे जोधपुर में वह लोग किसी मठ में रहते हैं.
वापस हम उसी स्थान पर आए जहाँ से गणेश गुफा जाने का मार्ग था. थोड़ा सा आगे ही गणेश गुफा है. कहते है यहाँ पर बैठ कर गणेश जी ने महाभारत ग्रंथ का लेखन किया था. रचनाकार वेद व्यास जी थे. पहले तो यह पहाड़ के बीच में गुफा थी पर अब वहाँ पर एक छोटा सा मंदिर बना दिया है. हम जब गुफा के अंदर पहुँचे, वहाँ से पानी बह रहा था. गणेश गुफा से आगे व्यास गुफा है. चढ़ाई चढ़ कर मैं और मेरी लड़की व्यास गुफा पहुँचे. मेरी पत्नी और लड़का गणेश गुफा के पास ही रहे. कैमरा उनके पास था इस कारण फोटो नहीं ले सका. वेद व्यास की गुफा के उपर एक चट्टान है जिस पर व्यास पोथी लिखा था. उसको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे विशालकाय ग्रंथों का पुलिंदा है. वहीं एक शिलालेख पर लिखा था, व्यास जी ने सत्तरह पुराणों की रचना की, पर उन्हे संतुष्टि नही मिली अंत में उन्होने अठारवाँ पुराण श्रीमद् भागवत की रचना की थी. व्यास जी के पुत्र शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को अंतिम समय में सुनाया था. गुफा छोटी सी पर साफ है जिसमें व्यास जी की प्रतिमा स्थापित है.
माना गाँव के लोग ऊन से तैयार किए हुए तरह-तरह के स्वेटर, कालीन आदि बेच रहे थे. वह यहाँ खेती भी करते हैं, हमारे ड्राइवर ने तो एक बोरा आलू का खरीद कर बस में रख लिया था.
बद्रीनाथ  धाम  
बद्रीनाथ  धाम  

हम लोग दो बजे बद्रीनाथ से वापस धर्मक्षेत्र के बाद कर्मक्षेत्र के लिए चल दिए. जाते समय ही हमने ड्राइवर को गरूड गंगा पर रुकने को कहा था पर तब तो वह रुका नहीं. मैंने दोबारा उसे याद कराया, लौटते समय वहाँ रुक कर चलना है. पीपलकोटि से पाँच किलोमीटर आगे
गरूड गंगा बहती है. यहाँ पर गरूड जी का मंदिर है. कहते है भगवान के बद्रीवन जाते समय गरूड जी यहीं रुक गये क्योंकि यहाँ गरूड जी के पसंद का भोजन सर्प. बहुतायत में थे. कहते हैं अगर किसी को कोई विषैला जीव काट लेता है उसे गरूड जी की प्रतिमा से स्पर्श करा दिया जाय तो उसका विष उतर जाता है. पढ़ा तो यह था , यहाँ पर लोग सर्पों के उन अवशेषों को जो कि पत्थरो के रूप में है. ढूँढते रहते हैं जिन्हे घर में रखने से घर में विषैले जीव-जन्तु का ख़तरा नहीं रहता है. ड्राइवर ने गरूण गंगा के पास बस रोकी. सड़क से नीचे गरूण गंगा बह रही थी. यहाँ पर लक्ष्मीनारायण का मंदिर है. उससे नीचे गरूण जी का मंदिर है. यहाँ पर हमसे पहले आए हुए एक परिवार वालों को पंडित जी पूजा किए हुए पत्थर दे रहे थे. मैंने भी उनसे लिए. हमारे साथ के बंगाली बाबू तो नदी के पास ढूंढ कर कुछ पत्थर ले आए.
हम जब नंद प्रयाग पहुँचे, अंधेरा ढल गया था. ड्राइवर ने यहीं रुकने का निर्णय किया पर पता लगा पिछले 2 दिनों से पानी नहीं आ रहा है होटल वालों ने ठहराने से मना कर दिया. अब 8 बजे के बाद ही हम कर्ण प्रयाग पहुँचे. यहाँ सड़क के किनारे एक होटल में केवल तीन कमरे ही खाली मिले दोनो बंगाली और एक गुजराती भाई ठहर गये. मुझे उस होटल वाले ने सामने के रेस्ट हाउस में 400 रुपये में एक कमरा देकर ठहराया. जब हम कमरे में पहुँचे तो देख कर सुखद आनंद आया कि साथ में ही एक नदी बह रही है. जिसकी कलकल की ध्वनि गूँज रही थी. सुबह उठ कर पता लगा कि यह तो पिंडर नदी है. होटल से आगे ही अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम था. सुबह के समय यहाँ से भी दूर पहाड़ों पर वर्फ़ से ढकी चोटी दिख रहीं थी संगम था. 

 अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम

 अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम

सब लोग तैयार होकर सुबह 8 बजे हरिद्वार के लिए चले. श्रीनगर से कुछ किलोमीटर पहले ड्राइवर ने बस रोक दी. पता लगा, पिछले 2 दिनों से आगे पहाड़ों से पत्थर टूट कर लगातार गिर रहे हैं रास्ता बंद है. गाड़ियाँ दूसरे रास्ते से जा रही थी जो की नियमित रास्ता नहीं था. हमारा ड्राइवर बोला मैं तो इस रास्ते से कभी गया नहीं हूँ, काफ़ी ख़तरनाक रास्ता है. हम लोगों ने कहा, जब सारे लोग अब उसी रास्ते से जा रहे हैं तो तुम्हे क्या परेशानी है? पता लगा परेशानी उसे यह थी की कुछ पैसे चाहिए थे. मतलब यह जो बोरा आलू का उसने खरीदा था वह उसे मुफ़्त का पड़ जाय . क्या करते मजबूरी थी. हमे हाँ करनी पड़ी. रास्ता काफ़ी संकरा था. सारा ट्रैफिक इस रास्ते पर आ जाने के कारण ट्रैफ़िक जाम भी हो रहा था. इस रास्ते पर चलते हुए डर भी लग रहा था. बहुत उँचे-उँचे पहाड़ो से होते हुए हमारी बस जा रही थी, कई जगह तो सड़क एकदम कच्ची मिट्टी की थी, डर लग रहा था कि इतने ट्रैफ़िक के वजन से अगर कहीं ढह गयी तो! सीधे सैकड़ों फ़ुट गहरी खाई में जाएँगे. हमने देखा की पहाड़ों को चोटी तक खेती हो रही है. विशालकाय पहाड़ों को सीढ़ी नुमा काट कर खेती की जा रही थी. इस रास्ते पर पेड़ तो बहुत कम थे. वैसे भी जब पहाड़ों को काट-काट कर खेती की जाएगी तो पेड़ तो बचेंगे कहाँ से? कोई बड़ी बात नही कि पेड़ों की जगह खेती करने से यहाँ भू-स्खलन ज़्यादा होता है. मुझे लगता है कि इस तरह पहाड़ों को काट कर खेती करना भी ग़लत है. और पहाड़ों मे सुरंग बना कर बाँध बनाना भी भू-स्खलन का बड़ा कारण है.

अब कुछ विशेष जानकारी बद्रीनाथ और केदारनाथ के बारे मे.
हरिद्वार से केदारनाथ 269 किलोमीटर है. हरिद्वार से ऋषिकेश 24 किलोमीटर, ऋषिकेश से शिवपुरी 13 किलोमीटर, शिवपुरी से व्यासी 4 किलोमीटर, व्यासी से कौड़ियाला 17 किलोमीटर, कौड़ियाला से देव प्रयाग 36 किलोमीटर, देव प्रयाग से श्रीनगर 38 किलोमीटर, श्रीनगर से कैला सौर 10 किलोमीटर, कैला सौर से रुद्रप्रयाग 35 किलोमीटर, रुद्रप्रयाग से तिलवाडा 9 किलोमीटर, तिलवाडा से अगस्त मुनि 9 किलोमीटर, अगस्त मुनि से कुंड 19 किलोमीटर, कुंड से गुप्त काशी 8 किलोमीटर, गुप्त काशी से सोन प्रयाग 28 किलोमीटर, सोन प्रयाग से गौरीकुण्ड 5 किलोमीटर, गौरी कुंड से रामबाड़ा की चढ़ाई 7 किलोमीटर, रामबाड़ा से केदारनाथ 7 किलोमीटर कुल दूरी 269 किलोमीटर,
केदारनाथ धाम 11824 फिट की उँचाई पर है. गौरी कुंड 6500 फिट की उँचाई पर है. लगभग 5000 फिट की उँचाई 14 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ कर पूरी करनी होती है.
केदारनाथ से गोपेश्वर होकर बद्रीनाथ 230 किलोमीटर है.
हरिद्वार से बद्रीनाथ धाम की दूरी 302 किलोमीटर है,
हरिद्वार से ऋषिकेश 24 किलोमीटर, ऋषिकेश से शिवपुरी 13 किलोमीटर, शिवपुरी से व्यासी 4 किलोमीटर, व्यासी से कौड़ियाला 17 किलोमीटर, कौड़ियाला से देव प्रयाग 36 किलोमीटर, देव प्रयाग से श्रीनगर 38 किलोमीटर, श्रीनगर से कैला सौर 10 किलोमीटर, कैला सौर से रुद्रप्रयाग 35 किलोमीटर, रुद्रप्रयाग से गौचर 10 किलोमीटर, गौचर से कर्णप्रयाग 10 किलोमीटर, कर्णप्रयाग से नंद प्रयाग 21 किलोमीटर, नन्दप्रयाग से चमोली 10 किलोमीटर, चमोली से पीपलकोटी 17 किलोमीटर, पीपलकोटी से जोशीमठ 13 किलोमीटर, जोशीमठ से विष्णुप्रयाग 12 किलोमीटर, विष्णु प्रयाग से गोविंद घाट 7 किलोमीटर, गोविंद घाट से पांडुकेश्वर 2 किलोमीटर, पांडुकेश्वर से बद्रीनाथ 23 किलोमीटर है
बद्रीनाथ धाम 11204 फ़ुट की उँचाई पर स्थित है.

हरिद्वार से केदारनाथ, HARDWAR TO KEDARNATH


हरिद्वार से केदारनाथ
3 वर्ष पहले की बात है जब हमारे आफ़िस  के सहकर्मी पहाड़ो पर घूमने जाने का प्रोग्राम बना रहे थे. इस तरह के टूर प्रोग्राम के लिए हमे  कंपनी के डाइरेक्टर से छुट्टी  लेनी  थी. आमतौर पर हमे 3 दिन की छुट्टी  मिलती थी. पर इस बार स्टाफ के कुछ लोगो ने डाइरेक्टर से 5 दिन की छुट्टी, मनाली जाने के लिए ले ली. जब मुझे पता लगा तो मैने कहा अब जब 5 दिन की छुट्टी मिल गयी है तो मनाली से तो अच्छा है बद्रीनाथ धाम चलो. हमलोग 5 दिन मे बहुत आराम से बद्रीनाथ धाम हो कर आ सकते हैं. मनाली तो फिर कभी हो आएँगे, पर उनके सर पर तो मनाली जाने का भूत सवार था. कुछ तो मेरी बात से सहमत भी हो गये पर अधिकतर मनाली जाने के मूड मे थे. बद्रीनाथ धाम के बारे मे मैने जो पढ़ा था वह ऑफीस स्टाफ के साथ मेल  भेज कर शेयर भी किया
. “It has been said that “there were many sacred spots of pilgrimage in the heaven, earth and The other world but neither is there any equal to Badrinath nor shall there be one.”
With its great scenic beauty and attractive recreational spots in the vicinity, Badrinath attracts an ever-increasing number of secular visitors each year.
पर आज कल के बहुत कम युवाओ  मे धार्मिक भावनाए देखने को मिलती हैं.  ज्यादातर  मौज मस्ती के लिए हिल स्टेशन  पर ही जाना पसंद करते है. एक तो बोला , मेरी माँ कहती हैं कि  इन जगाहों पर बूढ़े होने पर जाना चाहिए . कैसे – कैसे लोग और कैसी इनकी समझ.  सुन कर इन कम बुद्धि वालों पर गुस्सा आता है . जबकि मै समझता हूँ कि   युवावस्था  मे ही इन स्थानो पर जाना चाहिए तभी यात्रा का असली आनंद लिया जा सकता है.
बात आई गयी हो गयी पर मन मे यह बात बैठ गयी इस बार ना सही तो अगली बार बद्रीनाथ जाएँगे अवश्य अगले वर्ष फिर प्रोग्राम बनाया पर बन नहीं सका. इस बीच मे आफ़िस  की एक लेडी बोली  केदारनाथ धाम चलो  तो   मै  भी अपने पति के साथ चलूंगी. केदारनाथ के बारे मे सुना था की 14 किलोमीटर की बहुत कठिन चढ़ाई है.सबके लिए वहाँ जाना संभव नही. और हम तो शहरी जीवन के कुछ इस तरह अभ्यस्त हो गये है कि  थोड़ी दूर भी पैदल चला नही जाता. अगर तीसरी मंज़िल पर भी  जाना है तो लिफ्ट का इंतजार करते है.  इसलिए वहाँ जाने के बारे मे कभी सोंचा ही नही. परन्तु पता नही किस तरह धीरे- धीरे केदारनाथ धाम जाने की अभिलाषा जाग गयी और मन मे विचार आया कि  अब दोनो धाम जाएँगे. साथ  ही साथ सोंच लिया कि  अगर चढ़ाई नही चढ़ पाएँगे तो नीचे से (गौरी कुंड) से ही वापस आ जाएँगे, पर जाएँगे ज़रूर,  विचार आया , लगता है ऑफीस स्टाफ के  साथ वहाँ जाना नही हो सकेगा बेहतर है अपने परिवार के साथ ही चला जाय .  मैने एक जगह पढ़ा था

if you have an invitation from the God Himself, nothing can avert your visit; and hand-in-hand with it goes the destiny of returning home with a fulfilled experience.”
यही लगा की शायद बाकी स्टाफ के लोगो को भगवान ने अभी दर्शन देने का निमंत्रण नही दिया है.

अब वर्ष 2010 मे प्रोग्राम बनाया  कि  पाट खुलते ही दर्शन के लिए जाएँगे. सुना था  शुरू मे भीड़ कम होती है और आराम से दर्शन हो जाते है अन्यथा सीज़न के समय तो इतनी भीड़ हो जाती है कि   2-3 किलोमीटर तक लाइन लग जाती है. इस वर्ष मंदिर के पाट 18 मई  को खुले. मैने  हफ्ते बाद का प्रोग्राम बनाया था. परंतु  मेरे एक जानने वाले जो  वहाँ गये हुए थे उनसे  फ़ोन पर बात की तो पता लगा इस समय वह केदारनाथ मे है और बहुत  भीड़ है. गौरी कुंड से 3 किलोमीटर पहले से गाडियो की कतारे  लगी हुई है. सोंचा  इतनी भीड़ मे अफ़रा- तफ़री ज़्यादा होगी, दर्शन  होंगे नही, बेहतर है जब भीड़ कम होगी तभी जाएँगे. पर इस बार अगस्त - सितंबर  मे तो ऐसी मूसलाधार वर्षा हुई की हर तरफ बाढ़ की खबर आ रही थी. बद्रीनाथ धाम जाने का रास्ता ही ऐसी मूसलाधार वर्षा मे बह गया था. उत्तराखंड मे प्रक्रति का कुछ ज़्यादा ही प्रकोप हुआ था. ऋषिकेश मे तो गंगा के बीच मे लगी शिव की विशाल प्रतिमा तक बह गयी थी. कुछ जगहो पर बादल फटने से पूरा का पूरा गाँव  ही बह गया था.
सितंबर के अंतिम साप्ताह तक बारिश का प्रकोप थम गया था. बारिश के कारण टूटे हुए मार्गो का  निर्माण होने लगा था. मैने अक्तूबर मे दशहरे से एक हफ्ते पहले अपनी पत्नी को बताया कि हम लोग दशहरे पर बद्रीनाथ- केदारनाथ यात्रा पर चल रहे है. नवमी को पूजा के बाद हरिद्वार के लिए चलेंगे मैने अपनी लड़की जो कि जयपुर  मे इंजिनियरिंग  की पढ़ाई कर रही थी को फोन कर एक  दिन पहले बुला लिया. नवमी के दिन सुबह सुबह पूजा के बाद  लगभग सुबह 11 बजे एक टवेरा टैक्सी  कार जो  हरिद्वार जा रही थी उससे मोहन नगर से हरिद्वार के लिए रवाना हुए. मेरठ के बाद कार  मुजफ्फरपुर बाइ-पास पर पहुँच गई . यह नया बाइ-पास बन कर तैयार  हो रहा था. अभी टोल  टैक्स भी नही लिया जा रहा था. एक  दम साफ सुथरी सड़क थी, कार तेज़ी से फ़र्राटे भर रही थी. सड़क के दोनो ओर दूर दूर तक हरे- भरे खेत नज़र आ रहे थे. ऐसा सुंदर द्र्श्य   अब कम ही देखने को मिलता है. बचपन मे हम जब एक शहर से दूसरे शहर बस से जाते थे तब शहर की सीमा समाप्त होने के बाद अवश्य ऐसे द्र्श्य  का अवलोकन होता था परन्तु अब तो कंक्रीट के जंगल  तेज़ी से बढ़ते चले जा रहे हैं  पता ही नही लगता है कि कब एक   शहर की सीमा समाप्त हो गई और दूसरा शहर आ गया. यह नया बाइ-पास बना था , अभी सड़क के दोनो तरफ व्यावसायीकरण शुरू नही हुआ था. परन्तु कुछ समय बाद यह रास्ता इतना सुंदर नही नज़र आएगा. यहाँ पर भी खेतों की जगह व्यावसायिक, आवासिय गतिविधिया शुरू हो जाएँगी और फिर वही ट्रैफिक  जाम शुरू हो जाएगा. सरकार को चाहिए कि  कठोर शासनादेश  लागू करे कि  हाइवे दोनो तरफ कम से कम 500 मीटर तक कोई भी किसी भी तरह की व्यावसायिक या आवासिय गतिविधि ना हो. और अगर कोई करता है तो वहाँ के पुलिस ऑफीसर पर कड़ी करवाई की जाय. क्योकि  बिना  वहाँ की पुलिस की मर्ज़ी के गैर क़ानूनी निर्माण नहीं हो सकते. तभी हाइवे  या बाइ-पास बनाने का लाभ आम लोगो को मिल पाएगा. इस तरह के विचार लिए हुए हम 4 बजे हरिद्वार पहुँच गये. यहाँ पहुँच कर पहला काम रात  गुजारने के लिए होटेल ढूँढना था तत्पशचात आगे  की यात्रा का प्रबंध करना था. हर की पौड़ी  से कुछ दूर मुख्य बाजार मे हमे   होटेल मिल गया. समान कमरे मे रख कर होटेल से बाहर आकर केदारनाथ बद्रीनाथ जाने के लिए टैक्सी  आदि के बारे मे जानकारी जुटाने लगा. लोग टैक्सी  कार के 10000 से 15000  माँग रहे थे. मिनी बस का किराया 1000/- प्रति व्यक्ति था.  इस बीच शाम ढल गयी हम गंगा स्नान एवं शाम की गंगा आरती के लिए हर की पौड़ी  के  लिए चल दिए.  गंगा आरती के लिए सैकड़ो लोग हर की पौड़ी  के दोनो ओर गंगा  के किनारे इकट्ठे  हो रहे थे. आरती शुरू होने मे अभी आधा घंटा था, जल्दी से गंगा स्नान किया और फिर आरती मे शामिल हो गये. इस समय हल्का सा अंधेरा छाने  लगा था तभी वातावरण मे हर- हर गंगे , जै माँ गंगे  के स्वर गूंजने लगे. हर की पौड़ी  पर होने वाली गंगा आरती काफ़ी दर्शनीय होती है. जो कोई भी हरिद्वार गंगा स्नान के लिए आता है वह शाम की आरती मे  शामिल होने की कोशिश करता है. 
 हर की पौड़ी


 हर की पौड़ी

 हर की पौड़ी
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गंगा आरती से लौट कर होटेल मलिक से  दो धाम जाने की चर्चा की. वह बोला कल दशहरा है अब कोई ड्राइवर कल जाने को तैयार  नही है. महिंद्र  मिनी बस  जा रही है , उसमे आपकी 4 सीटे बुक करवाए देता हूँ आपको जो सीट पसंद हो आप वहाँ बैठ जाना, बाकी सवारी आपके बाद बैठेंगी. अन्यथा आपको एक दिन और रुकना पड़ेगा. कुछ सोंच कर मैने मिनी बस से जाने की हाँ कर दी क्योकि अब इतना समय नहीं था कि  दूसरी जगहों पर जा कर पूछ ताछ  की  जाय , इसलिए महिंद्र बस से जाने का ही विचार बना लिया.
दूसरे दिन सुबह 5.30 बजे उठ कर नित्यकर्म से निवृत हो कर गंगा स्नान के लिए हर की पौड़ी  पर पहुँच कर  गंगा स्नान किया.  इस समय गंगा मे पानी घुटने तक ही रह गया था, होटेल वाले ने बताया था कि  दशहरे पर गंगा घाट की सफाई होती है इस कारण दशहरे से दीवाली तक हर की पौड़ी  पर पानी रोक दिया जाता है. लौट कर होटेल पहुँचे तो 8 बज रहे थे. होटेल मालिक हमारा इंतजार कर रहा था. बोला जल्दी से समान ले कर आ जाय . गाड़ी वाले के सुबह से फोने आ रहे है. सब लोग आप लोगो का ही इंतजार कर रहे हैं. हमने कमरे मे आ कर समान पैक किया. नीचे उतर कर आए तो देखा होटेल मालिक ने दो रिक्शे बुला रखे थे. बोला इन रिक्शे वालो को 30-30 रुपये दे देना यह लोग आपको जहाँ से बस बन कर चलेगी वहाँ पहुँचा देंगे और मुझे 500 रुपये दे दो आपको रसीद दे देता हूँ बाकी 3500 रुपये बस मे बैठते समय दे देना.  मै समझ गया कि यह इसका कमीशन है, मैने होटेल मलिक को 500 रुपये दिए और उससे रसीद ले कर रिक्शे पर बैठ कर चल दिया. रिक्शे वाले ना जहाँ पर उतरा  यहाँ पर दो एक टेंपो,टॅक्सी खड़ी थी. एक महिंद्र मिनी बस जाने को तैयार  खड़ी थी. सभी वहाँ पर खड़े हम लोगो का इंतजार कर रहे थे. यूँ तो महिंद्र मिनी बस मे यह लोग 18 सवारी को बैठाते  है. पर दशहरा होने के कारण बस वाले  को पूरी सवारी नहीं मिली थी. केवल 13 लोग ही जा रहे थे. इस सफ़र मे  चार हम थे, 1 गुजराती. और 2 बंगाली  दंपति थे 3 मराठी  मानुष, इस तरह से 13 लोग  अलग- अलग प्रांतो  के थे पर मंज़िल सबकी एक थी. सबका समान बस की छत पर  पैक कर हरिद्वार से निकलते हुए 10  बज गये. हमारा पहला पड़ाव केदारनाथ था . कई टूर आपरेटर  पहले बद्रीनाथ ले जाते है उसके बाद केदारनाथ. वस्तुता सभी धामो के दर्शन के बाद बद्रीनाथ धाम के दर्शन के लिए जाना चाहिए और बद्रीविशाल के दर्शन के बाद सीधे घर जाते हैं रास्ते मे फिर किसी मंदिर या तीर्थ स्थान पर नही जाना चाहिए. केदारनाथ धाम मे भी ऐसा लिखा हुआ है.
ऋषिकेश से आगे  गंगा

ऋषिकेश से आगे  गंगा
ऋषिकेश से आगे बढ़ते ही पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया .इस यात्रा से पहले हम कभी ऋषिकेश से आगे नही गये थे.  हमारी बस पहाड़ी रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ रही थी. हमारे बाई ओर गंगा बह रही थी.  ज़्यादातर रास्ता धूल भरा हुआ था. अधिक बारिश के कारण सड़को की हालत काफ़ी खराब  हो गयी थी. सड़क के किनारे पहाड़ो को देख कर लग रहा था  पहाड़ बाढ़  के पानी से नहाए हुए हैं. पेड़ उखड़े पड़े थे. पहाड़ धूल मिट्टी से अटे  हुए थे.  बस गंगा के किनारे किनारे रास्ते मे छोटे छोटे से गाँवो , कस्बो से होती हुई चली जा रही थी. रास्ते मे देखा कई स्थानो पर शादी विवाह हो रहे थे. पहाड़ो पर दशहरा के दिन शादी विवाह के लिए बहुत शुभ माना जाता है. 

 ऋषिकेश से 13 किलोमीटर आगे शिवपुरी आता है यहाँ से गंगा के किनारे रेत मे लगे टेंट दिखने शुरू हो गये. शिवपुरी, ब्यासी और कौड़ियालिया  वाटर रफ्टिंग के लिए जाने जाते हैं. विशेषकर गर्मियो मे यहाँ काफ़ी लोग वॉटर रफ्टिंग के लिए आते है.करीब 1 बज रहा था जब हमारी बस देवप्रयाग पहुँची. ऋषिकेश से करीब 70 किलोमीटर देव प्रयाग है. यहाँ भागीरथी और अलकनंदा का संगम होता है. यहाँ से  गंगा के नाम से जाना जाता हैं.
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 देव प्रयाग

 देव प्रयाग

 भागीरथी और अलकनंदा का संगम 

 भागीरथी और अलकनंदा का संगम 


 मुख्य रूप से अलकनंदा के पाँच प्रमुख प्रयाग है. पाँच प्रयागो मे यह पाँचवा प्रयाग है. पहला प्रयाग विष्णु प्रयाग है जहाँ अलकनंदा से धौली गंगा मिलती है. दूसरा प्रयाग नन्दप्रयाग है यहाँ नन्दकिनी नदी अलकनंदा मे मिलती है. तीसरा प्रयाग कर्ण प्रयाग है यहाँ पिंडर नदी अलकनंदा मे मिलती है.  चौथा प्रयाग रुद्रप्रयाग है. रुद्रप्रयाग मे मंदाकिनी अलकनंदा से मिलती हैं और पाँचवा देव प्रयाग. देवप्रयाग से आगे  श्रीनगर   है (यह उत्तराखंड का श्रीनगर है ) ऋषिकेश से श्रीनगर  105 किलोमीटर है, यह उत्तराखंड का एक  बड़ा शहर है. श्रीनगर से आगे  रास्ते मे कई विददुत परियोजनाओ पर काम  चल रहा था.
landslide

 कुछ स्थानो पर देखता हूँ लबालब पानी से भरी हुई गंगा बह रही है और कुछ स्थानो पर गंगा मे बहुत कम पानी नज़र आता था. ऐसा लगता था  किसी ने पानी चुरा लिया हो. श्रीनगर  से आगे   कालिया सौर आता है यहाँ धरी देवी का मंदिर है
कालिया सौर से  आगे   रुद्रप्रयाग है. रुद्रप्रयाग ऋषिकेश से 140 किलोमीटर है
रुद्रप्रयाग 

रुद्रप्रयाग मे मंदाकिनी अलकनंदा   का संगम

 रुद्रप्रयाग से 9 किलोमीटर आगे  तिलवारा है यहाँ हम लोगो ने चाय पी. 10 मिनट का रेस्ट किया और फिर आगे  के लिए चल दिए. तिलवारा से 19 किलोमीटर आगे  अगस्तमुनि  है .  यहाँ अगस्तमुनि का आश्रम है.यहाँ पहुँचते हुए शाम ढलने लगी थी. हमारे बाईं ओर  मंदाकिनी सड़क के साथ साथ पत्थरो  के बीच अठखेलियाँ  करती हुई बह रही थी. बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक द्रशय था. सामने के पहाड़ो की चोटियो  पर सूर्यास्त की किरणे  पड़ने से सुनहरे रंग से चमक रही थी.मन तो कुछ समय यहाँ पर रुक कर प्राक्रतिक  सौंदर्य को  देखने को हो रहा था पर ड्राइवर को अपनी मंज़िल पहुँचने की थी. अगस्तमुनि  से 19 किलोमीटर आगे  कुंड है यहाँ पहुँचते हुए अँधेरा छा  गया था. अब ड्राइवर अँधेरे मे बस चला रहा था. गुप्त काशी  को पार  कर लगभग 8 बजे सोन प्रयाग  से 7 किलोमीटर पहले हम सीतापुर पहुँच गये. यहाँ ड्राइवर ने रात मे रुकने के लिए एक होटेल के सामने बस रोक दी और बोला रात यहीं रुकेंगे, आप लोग सामने होटेल मे जाकर अपने लिए कमरा  देख कर तय कर लो. यह होटेल बहुत ही साधारण था कमरो मे एक अजीब सी गंध आ रही थी. मन मे विचार आया ड्राइवर को यहाँ  से कमीशन  मिलता होगा तभी यहाँ रोका है. मैने अपने लड़के से नज़दीक के दूसरे होटेल देखकर आने को कहा और स्वयं दूसरी तरफ जाकर होटेल देखने लगा. मुझे इस होटेल से 100 गज पहले एक नया बना हुआ साफ सुथरा होटेल मिल गया. इस  समय सीजन ना होने के कारण बिल्कुल खाली था. इस  समय तक इतने बड़े होटेल मे हमारा ही परिवार था. हमे 400 रुपये के हिसाब से 2 डबल बेड का एक रूम मिल गया. मैने बस के दूसरे यात्रियों से भी बोला इस बेकार से होटेल मे ना ठहर कर मेरे वाले होटेल मे ठहरे.पर वह सारे उसी होटेल मे ही ठहरे. रात  मे जब हम खाना खाने बाहर निकले , मेरे से  कुछ घोड़े वाले घोड़ा तय करने के लिए कहने लगे. पहले तो मैने यह सोंचा था कि  गौरी कुंड से एक-दो किलोमीटर पैदल चलने के बाद अगर नहीं चला जाएगा तो घोड़े कर लेंगे पर अब जब यह लोग जिस तरह की बाते कर रहे थे उससे लगा कि तय  ही कर लेना चाहिए. आने जाने के लिए 800 रुपये प्रति घोड़ा तय हुआ.
 होटेल   से  केदार 

अगले दिन हम सुबह 5.30 बजे  उठ गये. हाँलाकि सफ़र की थकान के कारण इतने सुबह उठने की इच्छा  नही हो रही थी. उठ कर बिजली की केटली मे चाय बनाकर पी.  सफ़र मे बिजली की केटली और चाय बनाने का समान साथ ले कर चलता हूँ, क्योकि अक्सर इन स्थानो पर इतनी सुबह चाय नही मिलती  है.  7 बजे तक तैयार  होकर जब हम लोग बस के पास पहुँचे , देखा सारे लोग हम लोंगो का  इंतजार कर रहे थे. गुजराती भाई बोले हम तो सुबह 5 बजे ही तैयार हो गये थे, लेकिन क्या करे हम चार लोंगो को एक - एक  कर तैयार  होने मे समय तो लग ही जाता है. हाँलाकि हमे खराब भी लगा की हमारे कारण यह लोग इतना लेट हो गये. यहाँ  हमारी बस मे हमारा घोड़े वाला और एक दो दूसरे भी आ कर बैठ  गये. यह लोग भी घोड़े के मलिक थे
गौरिकुण्ड पहुँच कर हमारा घोड़े वाला ही हमारा मार्ग दर्शन करता चल रहा था. पहले हमे गौरिकुण्ड पर ले कर गया , दर्शनार्थी यहाँ से स्नान कर आगे  केदारनाथ के दर्शन के लिए जाते है. हम लोग होटेल मे ही नहा चुके थे और देर भी हो रही थी , घोड़े वाला बोला आप लोंगो पर गौरिकुण्ड का जल छिड़क देता हूँ . कुंड के कोने मे अपनी दुकान लगाए पंडा ने जब यह देखा तो ऐतराज़ करने लगा कुल मिला कर उसे लगा की यह घोड़े वाला वगैर  कुछ दान दच्छिणा के इन यात्रियों को लिए  जा रहा है.  
 गौरिकुण्ड

पंडा को दच्छिणा  देकर कर आगे  बढ़ा. तभी एक  पंडित जी आ गये , बोले केदारनाथ  जाने से पहले  गौरी के दर्शन करने चाहिए. अब वह  पंडित जी मुझे  गौरी मंदिर मे लेकर गये, केदारनाथ के पात खुलने से पहले भगवान केदारनाथ की डोली रात यही विश्राम के लिए रोकी जाती है. गौरी  मंदिर से  आगे  सिर कटा गणेश  का मंदिर है . बताया गया अब गणेश जी की प्रतिमा पर सिर लगा दिया गया है. पहले सिर कटे गणेश की प्रतिमा लगी थी. गौरिकुण्ड से करीब 500 गज आगे  बहुत से घोड़े वाले खड़े सवारी का इंतजार कर रहे थे.यहाँ पर हम लोगों को उसने दो घोड़े वालो को बुला कर आगे  ले जाने के लिए बोला. वस्तुता यह खच्चर  होते हैं हम सब खच्चर  पर बैठ कर पहाड़ के उबड़-खाबड़ रास्ते पर चल दिए.  हम पहली बार खच्चर  की सवारी कर रहे थेसुना था यह खाई के किनारे किनारे ही चलता है. मैने घोड़े वाले को बोला ,  पहाड़ की तरफ ही चलना है. वह बोला , आज कल . भीड़ नही है आप जिस साइड मे कहोगे उधर ही चलाएँगे पर भीड़ के समय तो हमे किनारे ही चलना होता है. यहाँ खच्चरो मे एक विशेष बात देखने को मिली कि रास्ते मे मुत्र त्याग यह अपने द्वारा निश्चित स्थानो पर ही कर रहे थे. थोड़ी- थोड़ी दूरी पर इन खच्चरो ने स्वयं मूत्र त्याग के स्थान निर्धारित कर रखे थे. ऐसा नही था कि इंसान  की तरह जहाँ मर्ज़ी आई खड़े हो गये.  मैने घोड़े वाले से पूछा कि   मूत्र त्याग के बारे मे तो इनके aticates  है पर मल त्याग के लिए इन्होने ने ऐसा कुछ स्थान क्यो नही बनाया है पर घोड़े वाले के पास  कोई जबाव नही था.  हमारे बाईं ओर मंदाकिनी बह रही थी. 
मंदाकिनी 

आगे  बढ़ने पर पहाड़ की तरफ एक छोटा सा मंदिर था घोड़े वाले ने बताया यह भीम मंदिर है. यहाँ पर हर 500 मीटर पर रास्ते की दूरी का बोर्ड लगा था जिससे यात्रियो को पता चलता रहे कि उन्होने कितनी दूरी तय कर ली है.
गौरिकुण्ड से सात किलोमीटर आगे  रामबाड़ा है. रामबाड़ा पहुँचने से 50 गज पहले  मंदाकिनी का जल पत्थरो से टकरा कर एक तेज शोर पैदा कर रहा था. यह शोर इतना तेज था कि लग रहा था  कई फाइटर विमान उड़ान भर रहें हो. मंदाकिनी का जल दूधया रंग का दिख रहा था. रामबाड़ा मे सभी खच्चर  वाले  विश्राम करते है,  




मंदाकिनी का  दूधया रंग का जल

मंदाकिनी

हम लोगो को बोला आप लोग भी जब तक चाय नाश्ता कर ले. यहाँ पर हमने लंगूर को मंदाकिनी के जल के बीच मे पड़े बड़े-बड़े पत्थरो पर इधर से उधर कूदते हुए देखा. रामबाड़ा मे कुछ एक छोटे होटेल भी है जहाँ  रात मे विश्राम भी किया जा सकता है. रामबाड़ा समुद्रतल से करीब 8500 फिट की उँचाई  पर है. रामबाड़ा के पास ही एक काफ़ी बड़ा उँचाई  से गिरता हुआ वाटर फॉल है. बहुत लोग यहाँ रुक कर फोटो खींच रहे थे.रामबाड़ा मे 15 मिनट के रेस्ट के बाद हम फिर खच्चर  पर बैठ  कर चल दिए.




केदार पर्वत शिखर
सामने केदारनाथ  मंदिर दिख रहा है 

केदार पर्वत शिखर



 अभी हम रामबाड़ा से आगे  बढ़े  ही थे कि  अचानक एक मोड़ पर देखता हूँ  सामने विराट, विशाल केदार पर्वत शिखर, धूप मे चाँदी की तरह चमकता हुआ अपने वैभव के साथ अवलोकित हुआ. यह द्र्श्य  अचंभित करनेवाला था. ऐसा अद्भुत , अलौकिक द्र्श्य  इससे  पहले कभी नही देखा था. इसकी सुंदरता  अवर्णित   थी.  हमारे पास शब्द नही होते है कि  उस सुंदरता का वर्णन कर सके. एक अलौकिक सौंदर्य  हमारे सामने था , हम गे से उसे निहार रहे थे तभी बदलो के बीच छिप  गया. सच तो यह है कि  फोटो से हमे उस जगह की सुंदरता का  आभास ही होता है. जब हम उस सुंदरता को अपनी नंगी आँखो से देखते हैं तभी हमे उस सौंदर्य   के दर्शन होते हैं. अब हमारी निगाहे. उस द्र्श्य  को देखने को बार- बार व्याकुल हो रही. थी पर कभी बदल छटते  और एक लक मिलती और छड़  भर मे फिर बदल आ जाते. रास्ते भर यही लुका - छुपी चलती रही.
मंदाकिनी का  दूधया रंग का जल 

केदार पर्वत शिखर

केदार पर्वत शिखर

रामबाड़ा से 3 किलोमीटर आगे  गरुड़ चट्टी  है. अभी हम 2 किलोमीटर आगे  बड़े होंगे , देखा कई विशालकाय गरुड़  हवा मे तैर  रहे है.ऐसा लग रहा था छोटे-छोटे हवाई जहाज़ उड़ रहे हैं. केदारनाथ मंदिर से आधा किलोमीटर पहले हमे घोड़े वाले ने उतार दिया. मंदिर के रास्ते मे हमे कई पंडा मिले जो  मंदिर मे पूजा करने के लिए हमसे हमारा निवास स्थान पूछ रहे थे. तभी एक पंडा बोले आप  लखनउ  की तरफ के है तो हमारे साथ आए , हम आपकी मंदिर मे पूजा करवा देंगे. मेरा पहला सवाल यही था , दच्छिणा क्या लेंगे. बोले जो आप की श्रधा  हो दे देना कोई ज़बरदस्ती नही है. मैने कहा मेरी श्रधा    251 रुपये देने की है. वह खुशी खुशी रास्ता बताते हुए हमारे साथ हो लिए. मंदिर से थोड़ी सी दूरी पर एक दुकान पर वह बोले आप लोग अपना समान  यहाँ रख कर मंदिर मे पूजा के लिए थाली ले लें, यहाँ ज़्यादा भीड़ नही थी. मंदिर के दोनो ओर दुकाने व खाने पीने के होटेल बने हुए थे. केदारनाथ धाम समुद्रतल से 11750 फिट की उँचाई  पर है. दोपहर का समय था  ज़्यादा ठंड नही थी. मैने अपनी जैकेट भी उतार  दी थी.
मंदिर के दोनो ओर दुकाने

मंदिर के दोनो ओर दुकाने


पूजा की थाली  लेकर हम सब पंडा जी के साथ मंदिर मे प्रवेश किया. मंदिर के प्रथम भाग मे पाँचो पांडव  की मूर्ति स्थापित है. मंदिर मे ज़्यादा भीड़ नही थी हमारे आगे 5-7 लोग खड़े अपनी बारी की प्रतिच्छा कर रहे थे. कुछ लोग शिवलिंग के चारो तरफ बैठे हुए पूजा कर रहे थे.  मै मंदिर के गर्भ ग्रह के प्रवेश द्वार पर खड़ा हुआ पंजो के बल उचक कर शिवलिंग के दर्शन करना चाह रहा था. केदारनाथ धाम मे गर्भ ग्रह के फोटो खींचना वर्जित है . इंटरनेट पर भी विग्रह के कोई फोटो मैने नही देखे. यहाँ के बारे मे जो पढ़ा सुना था वह यही कि  जब पांडव प्रायश्चित  के लिए भगवान शिव को ढूंडते हुए यहाँ आए तब शिव उनको दर्शन नही देना चाहते थे  वह व्रष रूप मे वहाँ चर रहे अन्य जानवरो मे शामिल हो गये. जब भीम ने यह देखा तो  दो पहाड़ो के बीच अपनी टाँगे फैला कर खड़े हो गये और  नकुल से कहा की सभी जानवरो को मेरी  टाँगो  के नीचे से निकालो.भीम जानते थे की शिव उनकी टाँगो  के बीच से नही निकल सकते. जब शिव ने यह देखा तो वहीं भूमि पर अपना सिर गड़ा कर  प्रथवी मे समाहित होने लगे. भीम ने जब यह देखा तो दौड़ कर पकड़ना चाहा तब तक व्रष रूपी शिव की केवल पीठ ही प्रथवी  के उपर बची थी. और वही व्रष का प्रष्ठ भाग को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है और उसी रूप मे यहाँ भगवान शिव की पूजा की जाती है.
 केदारनाथ  मंदिर 

 केदारनाथ  मंदिर 


 केदारनाथ  मंदिर 

यह करीब 9 फिट लंबी3 फिट चौड़ी और 4 फिट उँची विग्रह है. करीब 5-7 मिनट के बाद ही हमारा नंबर आ गया पंडा जी ने हमे शिवलिंग के बाईं ओर बैठा कर पूजा आरंभ की. वहीं मंदिर की दीवार  पर दिव्य ज्योति जल रही थी. पूजा के मध्य उसके दर्शन के लिए कहा तत्पश्चात  हम सबको घी को शिवलिंग पर मल कर जल से स्नान करवाया और अंत मे हम सबसे कहा, अपना मस्तक शिवलिंग मे लगाए. मेरी पत्नी कहती है . मुझे तो ऐसा लगा कि  मै अपना मस्तक किसी गुदगुदी चीज़ से स्पर्श कर रही हूँ. हम यही कह सकते है कि  “जाकी रही भावना जैसीतीन देखी मूरत  बिन वैसी”



 केदारनाथ  मंदिर



हम लोगो की एक ग्रुप फोटो भी उन्होने ने खींच दी. 
ग्रुप फोटो 




 शंकराचार्या की समाधि


  पढ़ा था केदारनाथ मंदिर के पीछे शंकराचार्या की समाधि  है. यहाँ आ कर विचार आया की जिन्होने ने सनातन धर्म की और चारो धाम की स्थापना की उनकी समाधि  के तो दर्शन वश्य करने चाहिए.  मैने उनसे शंकराचार्या  की समाधि  स्थल के बारे मे पुछा. वह हमे अपने साथ वहाँ लेकर गये. शंकराचार्या  की समाधि   मंदिर के पीछे बाईं ओर स्थित है. यह एक बड़ा सा हाल है यहाँ शंकराचार्या   की मूर्ति, उनकी माता की मूर्ति एवं अन्य मूर्ति  स्थापित है. लौटते समय वहाँ बैठे हुए  साधुओ को  दान देने लगा, पंडा जी ने देखा तो बोले आप को अगर दान करना है तो आप यह थैली इस  महिला को दे दें वह महिला मंदिर के द्वार  के पास बैठी  थी. पूछने पर उन्होने ने बताया की यह बद्रीनाथ धाम जाना चाहती है इसलिए मैने इसको सारे पैसे दिलवाए.

मेरे native place  वाले घर मे एक छोटा सा मंदिर बना है. इसमे शिवलिंग भी स्थापित है. माता जी पूजा के समय श्री शिव रुद्राष्टकम का पाट करती थी. प्रस्तुत है

श्री रुद्राष्टकम्
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाशमाकाशवासं भजेडहं॥1
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं, गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं, गुणागार संसारपारं नतोडहं॥2
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं, मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा, लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजेडहं भवानीपतिं भावगम्यं॥5
कलातीत कल्याण कल्पांतकारी, सच्चिदानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6
न यावद् उमानाथ पादारविंदं, भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7
न जानामि योगं जपं नैव पूजां, नतोडहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं, प्रभो पाहि शापन्न्मामीश शंभो॥8
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥9


2-3 घंटे मंदिर के पास बिता कर  वही एक होटेल मे खाना खाया. वापसी के लिए चल दिए.घोड़े वाला हमारा इंतजार कर रहा था.    उतरते समय तो बहुत दिक्कत महसूस हो रही थी. बार- बार पैर आगे शरीर  पीछे  घोड़े वाले सुनते सुनते परेशान  हो गया. रामबाड़ा मे जब 15 मिनट का रेस्ट लिया तो थोड़ी सी राहत  मिली पर अभी 7 किलोमीटर और जाना था. क्या करता फिर घोड़े पर बैठ कर चल दिए. घोड़े पर इतनी दिक्कत हो रही थी पर यह नही हुआ कि पैदल चल दे. यह बात जब नीचे उतर गये तब ध्यान आई. शायद अपने आप पर विश्वास नही था.  गौरिकुण्ड पहुँचते हुए अंधेरा  ढल आया था.  सभी लोग दर्शन कर के आ गये थे. बातो  ही बातो  मे पता लगा कि  एक बंगाली दंपति गौरी कुंड मे ही घूमते रहे वह उपर  गये ही नही. पूछने पर बताया की वह पैदल जा नही सकते थे और घोड़े पर बैठने से डर  लग रहा था. वापस होटेल पहुँचे. सभी खच्चर  की सवारी से इतने थके हुए थे कि कमरे मे पहुँचते ही बिस्तर पर लंबे हो गये.